निर्देश: प्र. सं. 43 से 47 के लिए दिए गए गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और प्रश्न का उत्तर दीजिए।
ईर्ष्या का काम जलाना है, मगर सबसे पहले वह उसी को जलाती है जिसके हृदय में उसका जन्म होता है। आप भी ऐसे बहुत से लोगों को जानते होंगे जो ईर्ष्या और द्वेष की साकार मूर्ति हैं, जो बराबर इस फिक्र में लगे रहते हैं कि कहाँ सुनने वाले मिलें कि अपने दिल का गुबार निकालने का मौका मिले। श्रोता मिलते ही उनका ग्रामोफोन बजने लगता है और वे बड़े ही होशियारी के साथ एक-एक काण्ड इस ढंग से सुनाते हैं, मानो विश्व कल्याण को छोड़कर उनका और कोई ध्येय नहीं हो। मगर, जरा उनके अपने इतिहास को भी देखिए और समझने की कोशिश कीजिए कि जबसे उन्होंने इस सुकर्म का आरंभ किया है, तबसे वे अपने क्षेत्र में आगे बढ़े हैं या पीछे हटे हैं। यह भी कि, अगर वे निंदा करने में समय और शक्ति का अपव्यय नहीं करते तो आज उनका स्थान कहाँ होता।
गद्यांश में ईर्ष्यालु व्यक्तियों की :
- Aस्तुति की गई है।
- Bखिल्ली उड़ाई गई है।
- Cप्रशंसा की गई है।
- Dउपासना की गई है।
Solution & Step-by-step Explanation
गद्यांश में लेखक ने ईर्ष्यालु व्यक्तियों के व्यवहार, दूसरों की निंदा करने की उनकी आदत, और उनके इस 'सुकर्म' पर व्यंग्य करते हुए उनकी 'खिल्ली उड़ाई है' (उपहास उड़ाया है) और उनके पतन को रेखांकित किया है।